हाल के दिनों में मीडिया के स्वरूप में व्यापक बदलाव देखने को मिला है। कभी-कभी न्यूज़ दिखाने के अलावा ज्यादतर समय वह बहुरंगी बहुरूपिया ही है। कभी मीडिया उपदेशक एवं प्रवचनकर्ता है तो कभी नौटंकी दिखाने वाला भाड़। भोजन बनाने के तरीके बताते समय वह एक बेहतरीन रसोइया है तो सेक्स संबंधी ज्ञान बाँटते हुए सेक्सोलाजिस्ट भी। अब इन तमाम आयामों में एक नया आयाम जुड़ गया है। यह मीडिया के जज की भूमिका में आने से संभव हुआ है। अब मीडिया के जज की भूमिका में है जहाँ किसी किसी भी वक्त किसी को भी न्याय या सजा मिल सकती है।
वैसे तो वैश्विक स्तर पर 19वीं सदी में ही मीडिया पर ऐसे आरोप लगने लगे थे पर भारत में मीडिया ने आजादी के कुछ वर्षों बाद से ही जुडिसियरी की प्रैक्टिस शुरू की है। शुरू में प्रिंट माध्यमों की अधिकता होने के कारण इसकी मात्रा एवं प्रसार- दोनों सीमित थे। पर केबल क्रांति के बाद से तो तस्वीर ही बदल गई। अब तो हर टीवी चैनल एक कोर्टरूम है, जहाँ हर पल निर्णय सुनाये जा रहे है। कुछ सुनाये गये निर्णयों की चीर -फाड़ हो रही है। कुछ नए ऑनलाइन ट्रायल भी चल रहे है - मीडिया ट्रायल।
कुछ लोगों, खासकर मीडिया बिरादरी के लोगों को इस शब्द पर आपत्ति हो सकती है पर अब यह मीडिया की प्रवृति बन चुकी है। न्यूज चैनल पर दिखाये गए कार्यक्रम के 45 मिनट बाद गाजियाबाद की एक लड़की को चाकू गोदकर मार दिया जाता है, मीडिया द्वारा न्यूज़ को असंवेदनहीन ढंग से प्रसारित कर दिए जाने के कारण अदनान मारा जाता है. यह मीडिया न्यायिक सेवा का दुष्परिणाम है। जहाँ मीडिया की न तो मामले से संवेदनशीलता से मतलब है और न ही उसके दूरगामी प्रभाव से। जिम्मेदार होकर न्याय तक पहुँचाने की तो बात ही छोड़ दीजिए।
वरिष्ठ पत्रकार एस.एन.विनोद के शब्दों में - भारतीय मीडिया जल्दबाजी का पुराना रोगी है। अधिकृत फ़ैसला सुनाने की उसे हमेशा जल्दी रहती है। यही कारण है कि मीडिया पर हमेशा गैर जिम्मेदार होने के आरोप लगते रहते हैं।
अदनान पात्रावाला की घटना पहली घटना नहीं है। 1992 में ठीक इसी तरह के आरोप भारतीय यूनिट के ट्रस्ट के पूर्व अध्यक्ष मनोहर जेटानंद फेरवानी की बेटी ने प्रेस पर लगाए थे। फेरवानी की बेटी मेनका जेबरी ने कहा था कि प्रेस ने मुझसे मेरे पिता को छीन लिया।मेनका ने कहा कि प्रेस ने 2500 करोड़ के शेयर घोटाले में जिस तरीके से उसके पिता को जांच-परिणाम आने से पूर्व ही दोषी करार दे दिया वह उसके पिता बर्दास्त नहीं कर पाए। उनकी हृदय आघात से मृत्यु हो गयी।
इन दोनों घटनाओं(अदनान एवं फेरवानी) के बीच भले ही 16 वर्ष अंतर हो एवं प्रिंट तथा इलेक्ट्रानिक का विभेद हो पर एक बात समान है कि दोनों में ‘मीडिया’ को ‘हत्यारा’ कहा गया है।
ऐसे में आत्म मंथन करने की बजाए दूसरे की आलोचना से ही जवाब देना हो तो फिर मासूम जनता का भविष्य तय है। मीडिया के एक वर्ग का कहना है कि कुछ लोग आलोचना करने के लिए आलोचना करते हैं और यह सब बकवास है। तो क्या एक बहुत बड़ा वर्ग यूँ ही बकवास किये जा रहा है। या कुछ ऐसा है जो दर्शकों, पाठकों को अब परेशान करने लगा।
सामाजिक कार्यकर्त्ता ऋतिका आनन्द कहती हैं कि "जब दर्शक किसी पति-पत्नी का तलाक न्यूज़ रूम में होते देखता है, या जब बाप बेटे की जंग टीवी पर सुलझाई या उलझापूर्ण जाती है तो कहीं न कहीं वह इन घटनाओं से सहम भी जाता है उसे लगता है कभी अगला शिकार वह भी हो सकता है।"
आज किसी भी न्यूज़ चैनल को कभी भी ऑन कीजिए कोई नितांत निजी पारिवारिक मामला सरे बाजार सबके सामने चीख चीख कर सुलझाया जाता हुआ मिल जायेगा। यदि मामला आपसी बातचीत सुलझाने लायक भी हो तो भी मीडिया न्यायालय में आने के बाद परिणाम नकारात्मक होने की ही संभावना अधिक होती है। अत्यधिक परेशानी के कारण असंतुलित मानसिक अवस्था वाले व्यक्ति से चतुर रिपोर्टर ऐसी बाते सरेआम बुलवा लेते हैं कि बाद में चाहकर भी सबकुछ पहले जैसा नहीं हो सकता। मेरे पति की दूसरी महिला से नाजायज संबंध् हैं । मेरी पत्नी कई-कई लोगों के साथ हमबिस्तर हो चुकी है। मेरे ससूर की निगाहे मुझपर गलत है या मेरी बहु बदचलन है। जैसे वाक्य ;स्लग्स एवं बाइट्स इतनी बार दुहराये होते हैं प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
समाजिक पहलुओं से परे मीडिया की न्यायाध्ीशीय भूमिका के कानूनी पहलू भी गौरतलब है। आए दिन अपनी ख़बरों एवं जांच-विहीन रिपोर्टों से मीडिया वाले जो भूमिका निभाते हैं, उससे जाने अनजाने कितने लोगों की मानहानि होती है। इसका स्वयं मीडिया को अंदाजा नही है। 2007 में लखनऊ के एक लोअर कोर्ट ने 1994 में आई.ए.एस ऑफिसर के खिलाफ लिखने (मान हानि के स्तर तक) 3 पत्रकारों एवं प्रिंटर पब्लिसर्स की जेल की सजा सुनाई थी ।
मनु शर्मा के केस का बचाव करने वाले पूर्व कानून मंत्री राम जेठमलानी ने कहा है कि कोर्ट की सर्वाधिक अवमानना तब होती है जब किसी अभियुक्त के बारे में जनता में एक तब पूर्वाग्रह बनाया जाय जब कोर्ट ट्रायल चल रहा हो।
यह अलग बात है कि बहुचर्चित जेसिका लाल एन शर्मा केस में मीडिया को उसकी गतिविधियों के लिए काफी प्रशंसा मिली। एक मुप फाईल बंद केस को जिसके पीछे बड़े-बड़े लोग लगे हों पुनः खुलवाने में मीडिया का योगदान काफी सराहनीय रहा है।
पर प्रश्न उठता है कि किसी अर्ध या पूर्ण न्यायिक मामले में मीडिया का दखल कबतक होना चाहिए एवं कितने देर तक इसकी इजाजत है। 17वें लॉ कमीशन के(अध्यक्ष एम. जगन्नाथ) के मुताबिक मीडिया को किसी ऐसे न्यायिक मसले को रिपोर्ट करने से बचना चाहिए जिसमें व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया हो और मामला न्यायालय को सुपुर्द हो।जबकि वर्तमान कन्टेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट लॉ (सेक्सन 3) 1971 के अनुसार कोर्ट की अवमानना तब होती है जब अनुसंधान पूरा कर लिया जाय एवं चार्जशीट हो जाये।
सुप्रीम कोर्ट ने भी 1969 में गोपालन एवं नूरदीन केस में गिरफ्तार के समय से ही कन्टेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट लॉलागू करने की बात की है। लॉ कमीशन इसी फैसले को कानून बनाना चाहता है। 17वें लॉ कमीशन ने सरकार के सामने जो 4 रिर्पोट्स प्रस्तुत की है उनमें एक का शीर्षक ट्रायल बाई मीडिया है। इसमें अन्य महत्वपूर्ण बातों के अलावा यह है कि गवाहों के मीडिया में इंटरव्यू पर रोक लगे एवं यू.के. आदि के तर्ज पर यहाँ भी हाईकोर्ट को यह अधिकार मिले कि वह किसी समाचार का प्रकाशन एवं प्रसारण रोकवा सके।
न्यायिक मामलें में मीडिया की विश्वसनीयता किस कदर कम है इसकी झलक इस वाक्य से मिलती है, जब बी.पी.ओ. में कार्यरत प्रतिभा श्रीकांत मूर्ति के बलात्कार एवं हत्या का केस सुन रही फास्ट ट्रैक कोर्ट की जब के सुकन्या जेल अधिकारीयों एवं वकीलों से बड़े तल्ख आवाज में कहती हैं कि - क्यों आपलोग उसे मीडिया से बात करने दे रहे है। क्या आप सब नियम कानून नहीं जानते। भविष्य में ऐसा हुआ तो मैं आप सब के खिलाफ कार्रवाई करूँगी।
कमोबेश पूरे विश्व में मीडिया सबसे पहले एवं सबसे तेज की होड़ का शिकार है। साथ ही निर्णय देना तो जैसे उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका में मीडिया ने बहुचर्चित बिस क्लिंटन मोनिका लेविंस्की केस में जमकर अपने अधिकारों का प्रयोग किया। बिल क्लिंटन के वकील केनेथ स्टार एवं अन्य वकीलों के कमेंटरी तक को लाइव किया गया। शुरू में क्लिंटन की ऐसी छवि बनाई गयी कि पूरी दुनिया में थू-थू होने लगी। जब केस मामूली सिद्ध हुआ क्लिंटन बच गए तो जनमत बनवाने वाली मीडिया उनकी किताब के प्रचार अभियान में जुट गयी।
एक अन्य घटना अमेरिका के ही वैज्ञानिक स्टीवेन हॉटफिल से संबधित है। हॉटफिल जीव विज्ञानी हैं इन पर अमेरिकी डाक के माध्यम से ऐन्थ्रैक्स के जीवाणु भेजने का आरोप लगा। मीडिया विपक्ष के वकील की भूमिका में आ गयी। पर हॉटफिल कानूनी तौर पर निर्दोष सिद्ध हो गए। जब उन्होने मुड़कर देखा तो पाया कि उनका सब कुछ बर्बाद हो गया है। उनकी नौकरी एवं इज्जत सब कुछ व्यापक मीडिया कवरेज की बलि चढ़ चुका था।
पुनः यदि भारत में मीडिया ट्रायल पर बात करें तो यह कहना गलत नहीं होगा कि यहाँ पिछले 60 वर्षों में जितने रियल ट्रायल हुए होंगे उससे कहीं ज्यादा रील ट्रायल इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रादुर्भाव के बाद पिछले 10 वर्ष में हुए हैं।
आप कोई भी चैनल देखिए आपको कोई न कोई केस लड़ा जाता हुआ दिख जायेगा। कुछ दीवानी मामले हैं, कुछ फौजदारी के कुछ बाल अपराध् से संबंधित हैं तो अन्य घरेलू अपराध से जुड़े मसले है। इन मुद्दों को सबका भला चाहने वाली हमारी मीडिया जड़ से सुलझाना चाहती। यह चाहती है कि किसी के घर में कोई भी छोटी से छोटी समस्या क्यों न हो वह इनके पास आए ताकि उस पर मीडिया पंचायत बिठाई जा सके। किसी की बेटी भाग गयी हो तो उसको यह बताया जा सके कि भागना उसका कानूनी हक है। किसी का बेटा अगर बागी हो गया हो तो उसे बाप के खिलाफ और सख्ती से खड़ा करवाया जा सके।
मीडिया पर शोध कर रहे आशुतोष सेठ का कहना है कि ऐसी ख़बरों के बार-बार आने से चारो तरफ अफरा-तफरी फैलती है। कभी टीवी पर एक झलक के लिए आ जाने को तरसने वाले लोग भी अब कैमरे से दूर भागने लगे हैं। वहीं दूसरी ओर दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके प्रशासनिक सेवा के लिए हिंदी की कोचिंग चला रहे कुमार सर्वेश कहते हैं कि यदि किसी अच्छी ख़बर को भी बार-बार दिखाया जायेगा तो संवेदना का स्तर गिरता जाएगा। एक स्थिति ऐसी आयेगी जब हम पाॅपर्कान खाते हुए बलात्कार की ख़बर देखने लगेंगे। वह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा।
तो क्या हम धीरे-धीरे उस स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ हम कुछ भी देखे सुने या पड़े कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जहाँ हमारे मनोमस्तिष्क पर कूड़ा - करकट का साम्राज्य होगा।
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