हाल के दिनों में मीडिया के स्वरूप में व्यापक बदलाव देखने को मिला है। कभी-कभी न्यूज़ दिखाने के अलावा ज्यादतर समय वह बहुरंगी बहुरूपिया ही है। कभी मीडिया उपदेशक एवं प्रवचनकर्ता है तो कभी नौटंकी दिखाने वाला भाड़। भोजन बनाने के तरीके बताते समय वह एक बेहतरीन रसोइया है तो सेक्स संबंधी ज्ञान बाँटते हुए सेक्सोलाजिस्ट भी। अब इन तमाम आयामों में एक नया आयाम जुड़ गया है। यह मीडिया के जज की भूमिका में आने से संभव हुआ है। अब मीडिया के जज की भूमिका में है जहाँ किसी किसी भी वक्त किसी को भी न्याय या सजा मिल सकती है।
वैसे तो वैश्विक स्तर पर 19वीं सदी में ही मीडिया पर ऐसे आरोप लगने लगे थे पर भारत में मीडिया ने आजादी के कुछ वर्षों बाद से ही जुडिसियरी की प्रैक्टिस शुरू की है। शुरू में प्रिंट माध्यमों की अधिकता होने के कारण इसकी मात्रा एवं प्रसार- दोनों सीमित थे। पर केबल क्रांति के बाद से तो तस्वीर ही बदल गई। अब तो हर टीवी चैनल एक कोर्टरूम है, जहाँ हर पल निर्णय सुनाये जा रहे है। कुछ सुनाये गये निर्णयों की चीर -फाड़ हो रही है। कुछ नए ऑनलाइन ट्रायल भी चल रहे है - मीडिया ट्रायल।
कुछ लोगों, खासकर मीडिया बिरादरी के लोगों को इस शब्द पर आपत्ति हो सकती है पर अब यह मीडिया की प्रवृति बन चुकी है। न्यूज चैनल पर दिखाये गए कार्यक्रम के 45 मिनट बाद गाजियाबाद की एक लड़की को चाकू गोदकर मार दिया जाता है, मीडिया द्वारा न्यूज़ को असंवेदनहीन ढंग से प्रसारित कर दिए जाने के कारण अदनान मारा जाता है. यह मीडिया न्यायिक सेवा का दुष्परिणाम है। जहाँ मीडिया की न तो मामले से संवेदनशीलता से मतलब है और न ही उसके दूरगामी प्रभाव से। जिम्मेदार होकर न्याय तक पहुँचाने की तो बात ही छोड़ दीजिए।
वरिष्ठ पत्रकार एस.एन.विनोद के शब्दों में - भारतीय मीडिया जल्दबाजी का पुराना रोगी है। अधिकृत फ़ैसला सुनाने की उसे हमेशा जल्दी रहती है। यही कारण है कि मीडिया पर हमेशा गैर जिम्मेदार होने के आरोप लगते रहते हैं।
अदनान पात्रावाला की घटना पहली घटना नहीं है। 1992 में ठीक इसी तरह के आरोप भारतीय यूनिट के ट्रस्ट के पूर्व अध्यक्ष मनोहर जेटानंद फेरवानी की बेटी ने प्रेस पर लगाए थे। फेरवानी की बेटी मेनका जेबरी ने कहा था कि प्रेस ने मुझसे मेरे पिता को छीन लिया।मेनका ने कहा कि प्रेस ने 2500 करोड़ के शेयर घोटाले में जिस तरीके से उसके पिता को जांच-परिणाम आने से पूर्व ही दोषी करार दे दिया वह उसके पिता बर्दास्त नहीं कर पाए। उनकी हृदय आघात से मृत्यु हो गयी।
इन दोनों घटनाओं(अदनान एवं फेरवानी) के बीच भले ही 16 वर्ष अंतर हो एवं प्रिंट तथा इलेक्ट्रानिक का विभेद हो पर एक बात समान है कि दोनों में ‘मीडिया’ को ‘हत्यारा’ कहा गया है।
ऐसे में आत्म मंथन करने की बजाए दूसरे की आलोचना से ही जवाब देना हो तो फिर मासूम जनता का भविष्य तय है। मीडिया के एक वर्ग का कहना है कि कुछ लोग आलोचना करने के लिए आलोचना करते हैं और यह सब बकवास है। तो क्या एक बहुत बड़ा वर्ग यूँ ही बकवास किये जा रहा है। या कुछ ऐसा है जो दर्शकों, पाठकों को अब परेशान करने लगा।
सामाजिक कार्यकर्त्ता ऋतिका आनन्द कहती हैं कि "जब दर्शक किसी पति-पत्नी का तलाक न्यूज़ रूम में होते देखता है, या जब बाप बेटे की जंग टीवी पर सुलझाई या उलझापूर्ण जाती है तो कहीं न कहीं वह इन घटनाओं से सहम भी जाता है उसे लगता है कभी अगला शिकार वह भी हो सकता है।"
आज किसी भी न्यूज़ चैनल को कभी भी ऑन कीजिए कोई नितांत निजी पारिवारिक मामला सरे बाजार सबके सामने चीख चीख कर सुलझाया जाता हुआ मिल जायेगा। यदि मामला आपसी बातचीत सुलझाने लायक भी हो तो भी मीडिया न्यायालय में आने के बाद परिणाम नकारात्मक होने की ही संभावना अधिक होती है। अत्यधिक परेशानी के कारण असंतुलित मानसिक अवस्था वाले व्यक्ति से चतुर रिपोर्टर ऐसी बाते सरेआम बुलवा लेते हैं कि बाद में चाहकर भी सबकुछ पहले जैसा नहीं हो सकता। मेरे पति की दूसरी महिला से नाजायज संबंध् हैं । मेरी पत्नी कई-कई लोगों के साथ हमबिस्तर हो चुकी है। मेरे ससूर की निगाहे मुझपर गलत है या मेरी बहु बदचलन है। जैसे वाक्य ;स्लग्स एवं बाइट्स इतनी बार दुहराये होते हैं प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
समाजिक पहलुओं से परे मीडिया की न्यायाध्ीशीय भूमिका के कानूनी पहलू भी गौरतलब है। आए दिन अपनी ख़बरों एवं जांच-विहीन रिपोर्टों से मीडिया वाले जो भूमिका निभाते हैं, उससे जाने अनजाने कितने लोगों की मानहानि होती है। इसका स्वयं मीडिया को अंदाजा नही है। 2007 में लखनऊ के एक लोअर कोर्ट ने 1994 में आई.ए.एस ऑफिसर के खिलाफ लिखने (मान हानि के स्तर तक) 3 पत्रकारों एवं प्रिंटर पब्लिसर्स की जेल की सजा सुनाई थी ।
मनु शर्मा के केस का बचाव करने वाले पूर्व कानून मंत्री राम जेठमलानी ने कहा है कि कोर्ट की सर्वाधिक अवमानना तब होती है जब किसी अभियुक्त के बारे में जनता में एक तब पूर्वाग्रह बनाया जाय जब कोर्ट ट्रायल चल रहा हो।
यह अलग बात है कि बहुचर्चित जेसिका लाल एन शर्मा केस में मीडिया को उसकी गतिविधियों के लिए काफी प्रशंसा मिली। एक मुप फाईल बंद केस को जिसके पीछे बड़े-बड़े लोग लगे हों पुनः खुलवाने में मीडिया का योगदान काफी सराहनीय रहा है।
पर प्रश्न उठता है कि किसी अर्ध या पूर्ण न्यायिक मामले में मीडिया का दखल कबतक होना चाहिए एवं कितने देर तक इसकी इजाजत है। 17वें लॉ कमीशन के(अध्यक्ष एम. जगन्नाथ) के मुताबिक मीडिया को किसी ऐसे न्यायिक मसले को रिपोर्ट करने से बचना चाहिए जिसमें व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया हो और मामला न्यायालय को सुपुर्द हो।जबकि वर्तमान कन्टेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट लॉ (सेक्सन 3) 1971 के अनुसार कोर्ट की अवमानना तब होती है जब अनुसंधान पूरा कर लिया जाय एवं चार्जशीट हो जाये।
सुप्रीम कोर्ट ने भी 1969 में गोपालन एवं नूरदीन केस में गिरफ्तार के समय से ही कन्टेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट लॉलागू करने की बात की है। लॉ कमीशन इसी फैसले को कानून बनाना चाहता है। 17वें लॉ कमीशन ने सरकार के सामने जो 4 रिर्पोट्स प्रस्तुत की है उनमें एक का शीर्षक ट्रायल बाई मीडिया है। इसमें अन्य महत्वपूर्ण बातों के अलावा यह है कि गवाहों के मीडिया में इंटरव्यू पर रोक लगे एवं यू.के. आदि के तर्ज पर यहाँ भी हाईकोर्ट को यह अधिकार मिले कि वह किसी समाचार का प्रकाशन एवं प्रसारण रोकवा सके।
न्यायिक मामलें में मीडिया की विश्वसनीयता किस कदर कम है इसकी झलक इस वाक्य से मिलती है, जब बी.पी.ओ. में कार्यरत प्रतिभा श्रीकांत मूर्ति के बलात्कार एवं हत्या का केस सुन रही फास्ट ट्रैक कोर्ट की जब के सुकन्या जेल अधिकारीयों एवं वकीलों से बड़े तल्ख आवाज में कहती हैं कि - क्यों आपलोग उसे मीडिया से बात करने दे रहे है। क्या आप सब नियम कानून नहीं जानते। भविष्य में ऐसा हुआ तो मैं आप सब के खिलाफ कार्रवाई करूँगी।
कमोबेश पूरे विश्व में मीडिया सबसे पहले एवं सबसे तेज की होड़ का शिकार है। साथ ही निर्णय देना तो जैसे उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका में मीडिया ने बहुचर्चित बिस क्लिंटन मोनिका लेविंस्की केस में जमकर अपने अधिकारों का प्रयोग किया। बिल क्लिंटन के वकील केनेथ स्टार एवं अन्य वकीलों के कमेंटरी तक को लाइव किया गया। शुरू में क्लिंटन की ऐसी छवि बनाई गयी कि पूरी दुनिया में थू-थू होने लगी। जब केस मामूली सिद्ध हुआ क्लिंटन बच गए तो जनमत बनवाने वाली मीडिया उनकी किताब के प्रचार अभियान में जुट गयी।
एक अन्य घटना अमेरिका के ही वैज्ञानिक स्टीवेन हॉटफिल से संबधित है। हॉटफिल जीव विज्ञानी हैं इन पर अमेरिकी डाक के माध्यम से ऐन्थ्रैक्स के जीवाणु भेजने का आरोप लगा। मीडिया विपक्ष के वकील की भूमिका में आ गयी। पर हॉटफिल कानूनी तौर पर निर्दोष सिद्ध हो गए। जब उन्होने मुड़कर देखा तो पाया कि उनका सब कुछ बर्बाद हो गया है। उनकी नौकरी एवं इज्जत सब कुछ व्यापक मीडिया कवरेज की बलि चढ़ चुका था।
पुनः यदि भारत में मीडिया ट्रायल पर बात करें तो यह कहना गलत नहीं होगा कि यहाँ पिछले 60 वर्षों में जितने रियल ट्रायल हुए होंगे उससे कहीं ज्यादा रील ट्रायल इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रादुर्भाव के बाद पिछले 10 वर्ष में हुए हैं।
आप कोई भी चैनल देखिए आपको कोई न कोई केस लड़ा जाता हुआ दिख जायेगा। कुछ दीवानी मामले हैं, कुछ फौजदारी के कुछ बाल अपराध् से संबंधित हैं तो अन्य घरेलू अपराध से जुड़े मसले है। इन मुद्दों को सबका भला चाहने वाली हमारी मीडिया जड़ से सुलझाना चाहती। यह चाहती है कि किसी के घर में कोई भी छोटी से छोटी समस्या क्यों न हो वह इनके पास आए ताकि उस पर मीडिया पंचायत बिठाई जा सके। किसी की बेटी भाग गयी हो तो उसको यह बताया जा सके कि भागना उसका कानूनी हक है। किसी का बेटा अगर बागी हो गया हो तो उसे बाप के खिलाफ और सख्ती से खड़ा करवाया जा सके।
मीडिया पर शोध कर रहे आशुतोष सेठ का कहना है कि ऐसी ख़बरों के बार-बार आने से चारो तरफ अफरा-तफरी फैलती है। कभी टीवी पर एक झलक के लिए आ जाने को तरसने वाले लोग भी अब कैमरे से दूर भागने लगे हैं। वहीं दूसरी ओर दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके प्रशासनिक सेवा के लिए हिंदी की कोचिंग चला रहे कुमार सर्वेश कहते हैं कि यदि किसी अच्छी ख़बर को भी बार-बार दिखाया जायेगा तो संवेदना का स्तर गिरता जाएगा। एक स्थिति ऐसी आयेगी जब हम पाॅपर्कान खाते हुए बलात्कार की ख़बर देखने लगेंगे। वह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा।
तो क्या हम धीरे-धीरे उस स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ हम कुछ भी देखे सुने या पड़े कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जहाँ हमारे मनोमस्तिष्क पर कूड़ा - करकट का साम्राज्य होगा।
सोमवार, 7 सितंबर 2009
टीआरपी का खेल पत्रकारिता नहीं

मीडिया क्या है?जो भी कुछ संचार के लायक है, उसको लोगों तक पहुँचाना चाहिए। मीडिया की मूल प्रेरणा यही है। सूचना में तथ्यों की तरफ ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए बजाय दूसरी बातों के । जब आप तथ्य बता देंगे तो इसके आधार पर राय बनाई जा सकती है।
"टी.आर.पी. के खेल को मैं पत्रकारिता नहीं मानता। जिसे जो दिखाना है वो दिखाए और हमें भी यह समझ लेना चाहिए कि वो मनोरंजन कर रहे हैं। यदि रास्ते में बैठकर कोई मदारी डमरू बजाते हुए बंदरिया नचा रहा तो उसको ये करने दीजिए, उसे ये हक है पर जिसे खबर देखनी होगी वह वहाँ नहीं जाएगा।"
पारंपरिक पत्रकारिता एवं आधुनिक मीडिया में आप क्या फर्क मानते हैं? मात्र इतना फर्क है कि अब कई लोग मात्र मनोरंजन के लिए एक दूसरे को क्षति पहुँचाना चाहते हैं। हमारे चैनल वही काम कर रहे हैं। हमारे अखबार भी वही काम कर रहे हैं। मैं दो अख़बारों को जानता हूँ जो यही काम कर रहे हैं। क्योंकि अगर आप कमाई करना ही अपना उद्देश्य मानते हैं तो आपको यही करना होगा। भारत में यह प्रक्रिया कब से शुरू हुई ?यह भारत में पिछले कोई 15-20 साल में हुआ है लेकिन यूरोप और अमेरिका में यह प्रक्रिया बहुत सालों से चल रही है। पत्रकारिता वह है जो तथ्यों को, सूचनाओं को एवं मतों को एक से दूसरे तक पहुँचाए और जिसका काम केवल मनोरंजन हो वह केवल मीडिया हो सकता है पत्रकारिता नहीं। पत्रकारिता पहले मिशन हुआ करती थी अब प्रोफेशन में बदल रही है, इस पर आप क्या कहेंगे?पत्रकारिता प्रोफशन भी हो जाए तो कोई खराबी नहीं क्योंकि जिस जमाने में पत्रकारिता देश की आजादी के लिए काम करने में लगी हुई थी उस समय चूँकि आजादी एक राष्ट्रीय मिशन था इसलिए उसका काम करने वाली पत्रकारिता भी राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्त करने का मिशन बनी। अब उसमें से कम से कम राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर ली गई है। कुछ हद तक सामाजिक स्वतंत्रता भी प्राप्त कर ली गई है। लेकिन पूरी सामाजिक आजादी और आर्थिक आजादी नहीं मिल पायी। अब उसके लिए अगर आप ठीक से पूरी व्यावसायिकता के साथ काम करें तो पत्रकारिता का ही काम आप करेंगे। लेकिन यह हुनर का काम सूचना का होगा, लोकमत बनाने का होगा, मनोरंजन का नहीं होगा। यदि मनोरंजन का होगा तो आप मीडिया का काम कर रहे हैं। प्रोफेशनल जर्नलिज्म पर जो सबसे बड़ा आरोप लगता है कि इसमें मानवीय तत्वों का अभाव होता है, जैसा कि पिछले कुछ समय पहले एक नामी चैनल के पत्रकारों ने 15 अगस्त की पूर्व संध्या पर एक अदद् न्यूज़ की चाह में बिहार में एक व्यक्ति को जलकर आत्महत्या करने में न केवल सहायता दी बल्कि उसे उकसाया भी।आदमी को जलाकर उसकी खबर बनाना कभी पत्रकारिता नहीं हो सकती। यह तो स्कैंडल है। यह माफिया का काम है। ऐसा हो तो आप कुछ भी कर दें, जाकर मर्डर कर दें और कहें यह हमने पत्रकारिता के लिए किया है क्योंकि मुझे मर्डर की कहानी लिखनी थी। यदि एक पत्रकार ने यह न भी किया हो फिर भी यदि वह किसी जलते हुए आदमी को कवर कर रहा हो तो उसे क्या करना चाहिए?पहले उस आदमी को बचाना चाहिए। यह तो उसके प्रोफेशन में अवरोध् है?नहीं, वह उसको बचाकर, उसने क्यों मरने की कोशिश की, इसकी वजह पता लगा कर उसकी खबर मजे में लिख सकता है। आप न्यूज़ चैनल्स देखते हैं? कौन से चैनल आप को ज्यादा पसंद हैं?मुझे पसंद तो कुछ भी नहीं आता फिर भी खबरें देखता हूँ। मैं मानता हूँ कि खबरें टी.वी. से गायब होती जा रही हैं पहले जिस दूरदर्शन को हम हिकारत की नजर से देखते थे कि वहाँ ख़बर नहीं है, अब कहीं खबर यदि है तो वह आपको दूरदर्शन से ही मिल सकती है। चैनल्स तो ख़बर सुनाकर इंटरटेन करने में लग जाते हैं। अगर इंटरटेनमेंट करना चाहते हैं तो जरूर करें पर अपने आपको खबरिया चैनल कहना छोड़ दें। एक स्थापित चैनल के शीर्षस्थ अधिकारी ने कहा है कि लोग कचरा ही देखना चाहते हैं इसलिए हम कचरा परोसते हैं, आप क्या सोचते है?जो कचरा देखना चाहते हैं और जो दिखाना चाहते हैं वे जरूर दिखाएँ,लेकिन न्यूज़ कचरा नहीं है। आजकल प्राइम टाइम पर साँप, छिपकली, घड़ियाल, भूत और बाबाओं को दिखाया जा रहा है, इस पर क्या कहेंगे?दरअसल प्राइम टाईम अब प्राईम इंटरटेनमेंट का रूप ले लिया है और चैनल्स इसे दिखा रहे हैं। इंडिया टी.वी. ने यही सब दिखाकर जबरदस्त टी.आर.पी. बटोरी है।हाँ दिखाएँ लेकिन याद रखिए ये पत्रकारिता नहीं है। टी.आर.पी. के खेल को मैं पत्रकारिता नहीं मानता। जिसे जो दिखाना है वो दिखाए और हमें भी यह समझ लेना चाहिए कि वो मनोरंजन कर रहे हैं। यदि रास्ते में बैठकर कोई मदारी डमरू बजाते हुए बंदरिया नचा रहा तो उसको ये करने दीजिए, उसे ये हक है पर जिसे खबर देखनी होगी वह वहाँ नहीं जाएगा। एक प्रख्यात समाजशास्त्री ने कहा है कि एक अच्छी खबर को भी बार-बार दिखाया जाता है तो वह संवेदनहीन हो जाती है। इस पर आप क्या कहेंगे?हाँ ये सत्य है क्योंकि मनुष्य की खबर को, खबर तक, खबर जैसी स्वीकार करने की जो क्षमता है वह सीमित है। अगर आप बार-बार वही करेंगे तो फिर उसको उस तरीके से नहीं लेगा। इसलिए एक बार दिखाई जाएगी वही खबर होगी उसके बाद उसका फालो-अप होगा फिर उसका फालो-अप होगा और वह अपनी संवेदना खोती जाएगी। कई बार कुछ खबरें स्क्रीन पर बड़े धमाके से दिखाईं जाती हैं पर अगले ही दिन गायब हो जाती हैं, ऐसा क्यों होता है?इसके कई कारण हो सकते हैं। इसके कारण ये हो सकते हैं कि जो खबर दिखाई गई होगी वो कहते होंगे कि ये गलत है तो उसको समझदारी में छोड़ भी सकते हैं। ये भी हो सकता है जो खबर दिखाई गई हो वह उन लोगों को बुरा लगा होगा उन्होंने दबाव डालकर उसको रूकवा दिया होगा। ये भी हो सकता है कि उन्होंने उसको पैसा दे दिया हो और वो ब्लैकमेल के लिए ही दिखायी जा रही हो। उसका मकसद पूरा होने पर उसे खत्म कर दिया। अखबारों के बदलते हुए कलेवर पर आप क्या कहेंगे?अख़बारों के बारे में भी वही सच है जो चैनल के बारे में। जिनका काम सूचित करना और लोकमत बनाना है वो अब भी पत्रकारिता कर रहे हैं और जिनका काम मनोरंजन करना और मन बहलाना है वो मनोरंजन उद्योग में चले गए हैं। हमने नवउदारवादी व्यवस्था स्वीकार की और जब बाजार एक नए रूप में सामने आया तब से यानि कोई 15 साल से हमारे यहाँ अखबार प्रोडक्ट बनने लगे हैं। आप पत्रकारिता का क्या भविष्य देखते हैं?आप कुछ भी कर लें खबर के नाते खबर का भविष्य हमेशा रहेगा क्योंकि मनुष्य की जिज्ञासा हमेशा रहने वाली है और मनुष्य हमेंशा कम्युनिकेट करने के लिए खबर देगा। उससे जिसे कमाई करनी है उसका लेवल हमेशा बदलता रहेगा, जिसको ज्यादा करना है वह जो भी करे उसको छूट है वह पोर्नोग्रापफी में चला जाए, हमको क्या एतराज है, यदि देश का कानून उसकी इजाजत देता हो और परंपराएँ समर्थन करती हों। क्या न्यूज़ कन्टेन्ट के कमजोर हाने के कारण हमें उसके लिए बाह्य कलेवर एवं तड़क- भड़क का सहारा लेना पड़ रहा है?यह टेलीवीजन का असर है टी.वी. में कन्टेन्ट ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं होता उसका फॉर्म महत्वपूर्ण होता है। इसलिए जितना टी.वी. का असर होता जाएगा उतना कथ्य गायब होता जाएगा। उसको दिखाने का तरीका हावी होता जाएगा।
"टी.आर.पी. के खेल को मैं पत्रकारिता नहीं मानता। जिसे जो दिखाना है वो दिखाए और हमें भी यह समझ लेना चाहिए कि वो मनोरंजन कर रहे हैं। यदि रास्ते में बैठकर कोई मदारी डमरू बजाते हुए बंदरिया नचा रहा तो उसको ये करने दीजिए, उसे ये हक है पर जिसे खबर देखनी होगी वह वहाँ नहीं जाएगा।"
पारंपरिक पत्रकारिता एवं आधुनिक मीडिया में आप क्या फर्क मानते हैं? मात्र इतना फर्क है कि अब कई लोग मात्र मनोरंजन के लिए एक दूसरे को क्षति पहुँचाना चाहते हैं। हमारे चैनल वही काम कर रहे हैं। हमारे अखबार भी वही काम कर रहे हैं। मैं दो अख़बारों को जानता हूँ जो यही काम कर रहे हैं। क्योंकि अगर आप कमाई करना ही अपना उद्देश्य मानते हैं तो आपको यही करना होगा। भारत में यह प्रक्रिया कब से शुरू हुई ?यह भारत में पिछले कोई 15-20 साल में हुआ है लेकिन यूरोप और अमेरिका में यह प्रक्रिया बहुत सालों से चल रही है। पत्रकारिता वह है जो तथ्यों को, सूचनाओं को एवं मतों को एक से दूसरे तक पहुँचाए और जिसका काम केवल मनोरंजन हो वह केवल मीडिया हो सकता है पत्रकारिता नहीं। पत्रकारिता पहले मिशन हुआ करती थी अब प्रोफेशन में बदल रही है, इस पर आप क्या कहेंगे?पत्रकारिता प्रोफशन भी हो जाए तो कोई खराबी नहीं क्योंकि जिस जमाने में पत्रकारिता देश की आजादी के लिए काम करने में लगी हुई थी उस समय चूँकि आजादी एक राष्ट्रीय मिशन था इसलिए उसका काम करने वाली पत्रकारिता भी राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्त करने का मिशन बनी। अब उसमें से कम से कम राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर ली गई है। कुछ हद तक सामाजिक स्वतंत्रता भी प्राप्त कर ली गई है। लेकिन पूरी सामाजिक आजादी और आर्थिक आजादी नहीं मिल पायी। अब उसके लिए अगर आप ठीक से पूरी व्यावसायिकता के साथ काम करें तो पत्रकारिता का ही काम आप करेंगे। लेकिन यह हुनर का काम सूचना का होगा, लोकमत बनाने का होगा, मनोरंजन का नहीं होगा। यदि मनोरंजन का होगा तो आप मीडिया का काम कर रहे हैं। प्रोफेशनल जर्नलिज्म पर जो सबसे बड़ा आरोप लगता है कि इसमें मानवीय तत्वों का अभाव होता है, जैसा कि पिछले कुछ समय पहले एक नामी चैनल के पत्रकारों ने 15 अगस्त की पूर्व संध्या पर एक अदद् न्यूज़ की चाह में बिहार में एक व्यक्ति को जलकर आत्महत्या करने में न केवल सहायता दी बल्कि उसे उकसाया भी।आदमी को जलाकर उसकी खबर बनाना कभी पत्रकारिता नहीं हो सकती। यह तो स्कैंडल है। यह माफिया का काम है। ऐसा हो तो आप कुछ भी कर दें, जाकर मर्डर कर दें और कहें यह हमने पत्रकारिता के लिए किया है क्योंकि मुझे मर्डर की कहानी लिखनी थी। यदि एक पत्रकार ने यह न भी किया हो फिर भी यदि वह किसी जलते हुए आदमी को कवर कर रहा हो तो उसे क्या करना चाहिए?पहले उस आदमी को बचाना चाहिए। यह तो उसके प्रोफेशन में अवरोध् है?नहीं, वह उसको बचाकर, उसने क्यों मरने की कोशिश की, इसकी वजह पता लगा कर उसकी खबर मजे में लिख सकता है। आप न्यूज़ चैनल्स देखते हैं? कौन से चैनल आप को ज्यादा पसंद हैं?मुझे पसंद तो कुछ भी नहीं आता फिर भी खबरें देखता हूँ। मैं मानता हूँ कि खबरें टी.वी. से गायब होती जा रही हैं पहले जिस दूरदर्शन को हम हिकारत की नजर से देखते थे कि वहाँ ख़बर नहीं है, अब कहीं खबर यदि है तो वह आपको दूरदर्शन से ही मिल सकती है। चैनल्स तो ख़बर सुनाकर इंटरटेन करने में लग जाते हैं। अगर इंटरटेनमेंट करना चाहते हैं तो जरूर करें पर अपने आपको खबरिया चैनल कहना छोड़ दें। एक स्थापित चैनल के शीर्षस्थ अधिकारी ने कहा है कि लोग कचरा ही देखना चाहते हैं इसलिए हम कचरा परोसते हैं, आप क्या सोचते है?जो कचरा देखना चाहते हैं और जो दिखाना चाहते हैं वे जरूर दिखाएँ,लेकिन न्यूज़ कचरा नहीं है। आजकल प्राइम टाइम पर साँप, छिपकली, घड़ियाल, भूत और बाबाओं को दिखाया जा रहा है, इस पर क्या कहेंगे?दरअसल प्राइम टाईम अब प्राईम इंटरटेनमेंट का रूप ले लिया है और चैनल्स इसे दिखा रहे हैं। इंडिया टी.वी. ने यही सब दिखाकर जबरदस्त टी.आर.पी. बटोरी है।हाँ दिखाएँ लेकिन याद रखिए ये पत्रकारिता नहीं है। टी.आर.पी. के खेल को मैं पत्रकारिता नहीं मानता। जिसे जो दिखाना है वो दिखाए और हमें भी यह समझ लेना चाहिए कि वो मनोरंजन कर रहे हैं। यदि रास्ते में बैठकर कोई मदारी डमरू बजाते हुए बंदरिया नचा रहा तो उसको ये करने दीजिए, उसे ये हक है पर जिसे खबर देखनी होगी वह वहाँ नहीं जाएगा। एक प्रख्यात समाजशास्त्री ने कहा है कि एक अच्छी खबर को भी बार-बार दिखाया जाता है तो वह संवेदनहीन हो जाती है। इस पर आप क्या कहेंगे?हाँ ये सत्य है क्योंकि मनुष्य की खबर को, खबर तक, खबर जैसी स्वीकार करने की जो क्षमता है वह सीमित है। अगर आप बार-बार वही करेंगे तो फिर उसको उस तरीके से नहीं लेगा। इसलिए एक बार दिखाई जाएगी वही खबर होगी उसके बाद उसका फालो-अप होगा फिर उसका फालो-अप होगा और वह अपनी संवेदना खोती जाएगी। कई बार कुछ खबरें स्क्रीन पर बड़े धमाके से दिखाईं जाती हैं पर अगले ही दिन गायब हो जाती हैं, ऐसा क्यों होता है?इसके कई कारण हो सकते हैं। इसके कारण ये हो सकते हैं कि जो खबर दिखाई गई होगी वो कहते होंगे कि ये गलत है तो उसको समझदारी में छोड़ भी सकते हैं। ये भी हो सकता है जो खबर दिखाई गई हो वह उन लोगों को बुरा लगा होगा उन्होंने दबाव डालकर उसको रूकवा दिया होगा। ये भी हो सकता है कि उन्होंने उसको पैसा दे दिया हो और वो ब्लैकमेल के लिए ही दिखायी जा रही हो। उसका मकसद पूरा होने पर उसे खत्म कर दिया। अखबारों के बदलते हुए कलेवर पर आप क्या कहेंगे?अख़बारों के बारे में भी वही सच है जो चैनल के बारे में। जिनका काम सूचित करना और लोकमत बनाना है वो अब भी पत्रकारिता कर रहे हैं और जिनका काम मनोरंजन करना और मन बहलाना है वो मनोरंजन उद्योग में चले गए हैं। हमने नवउदारवादी व्यवस्था स्वीकार की और जब बाजार एक नए रूप में सामने आया तब से यानि कोई 15 साल से हमारे यहाँ अखबार प्रोडक्ट बनने लगे हैं। आप पत्रकारिता का क्या भविष्य देखते हैं?आप कुछ भी कर लें खबर के नाते खबर का भविष्य हमेशा रहेगा क्योंकि मनुष्य की जिज्ञासा हमेशा रहने वाली है और मनुष्य हमेंशा कम्युनिकेट करने के लिए खबर देगा। उससे जिसे कमाई करनी है उसका लेवल हमेशा बदलता रहेगा, जिसको ज्यादा करना है वह जो भी करे उसको छूट है वह पोर्नोग्रापफी में चला जाए, हमको क्या एतराज है, यदि देश का कानून उसकी इजाजत देता हो और परंपराएँ समर्थन करती हों। क्या न्यूज़ कन्टेन्ट के कमजोर हाने के कारण हमें उसके लिए बाह्य कलेवर एवं तड़क- भड़क का सहारा लेना पड़ रहा है?यह टेलीवीजन का असर है टी.वी. में कन्टेन्ट ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं होता उसका फॉर्म महत्वपूर्ण होता है। इसलिए जितना टी.वी. का असर होता जाएगा उतना कथ्य गायब होता जाएगा। उसको दिखाने का तरीका हावी होता जाएगा।
जोजेफ पुलित्ज़रः पत्रकारिता के इतिहास पुरूष

पत्रकारिता के नोबेल पुरस्कार नाम से जाने जाने वाले पुलित्ज़र पुरस्कार के जनक जोजेफ पुलित्ज़र थे। उनका जन्म 10 अप्रैल 1847 को हंगरी में हुआ था।
अपने भविष्य से बेखबर पुलित्ज़र युवावस्था में अमेरिका आकर वहाँ की सेना में 1869 में भर्ती हो गए। पर अधिक समय तक वहाँ नहीं टिक पाये। बाद में उन्होंने जर्मनी के एक प्रमुख अख़बार ‘वेस्टलिशे पोस्ट’ में काम करना शुरू किया। अपने जुझारू एवं कर्मठ व्यक्तित्व के कारण पुलित्ज़र आगे चलकर वेस्टलिशे पोस्ट के हिस्सेदार भी बन गए।
पुलित्ज़र ने 19वीं सदी में ही ख़ोजी पत्रकारिता के महत्त्व पहचाना। उन्होंने अपनी खोजी पत्रकारिता का निशाना, सरकारी भ्रष्टाचारियों, टैक्स चोरी करने वाले लोगों एवं जुएबाजों आदि को बनाया। वे पत्रकारिता के महत्त्व को काफी अच्छी तरह समझते थे। एक बार उन्होंने कहा था कि अमेरिका का भविष्य गढ़ने की शक्ति पत्रकारों के भावी पीढ़ियों के हाथों में है।
मात्र 25 वर्ष की आयु में ही पुलित्ज़र एक प्रकाशक बन गए जिसके बाद बिज़नेस संबंधी सुझबुझ एवं दूरदर्शिता दिखाते हुए 1878 में ‘सेंट लुइस पोस्ट डिस्पैच’ के मालिक बन गए। इससे उनकी छवि जर्नलिस्ट एवं उद्यमी दोनों के रूप में निखर कर सामने आई। अब लोग उनकों काफी संजीदगी से लेने लगे।अब तक अमेरिका में रह रहे पुलित्ज़र पूर्ण अमेरिकी हो चुके थे। पर एक लक्ष्य को लेकर जुनून की हद तक मेहनत करने वाले पुलित्ज़र को इसकी कीमत चुकानी पड़ी। उनकी आँखे कमजोर हो गयीं। वे बीमार बड़ गए। डाॅक्टरों ने उन्हें छुट्टी पर जाने की सलाह दी। पर स्टीमर से सैर पर जाने की बजाए उन्होंने जे गोल्ड नामक फायनेंसर से ‘दि न्यूयाॅर्कवर्ल्ड ’ नामक अख़बार को खरीदने की बात की। यह अख़बार उस समय आर्थिक तंगी से गुजर रहा था। धुन के पक्के पुलित्जर ने इस अख़बार को भी वेस्टलीशे पोस्ट की तर्ज पर पुनः खड़ा कर दिया। यह बहुत बड़ी जीत थी। कुछ ही दिनों में ‘दि वर्ल्ड की बिक्री छः लाख प्रातियों तक पहुँच गयी और वह सबसे अधिक बिकने वाला अख़बार बन गया। इस अप्रत्याशित सपफलता से उनके कई दुश्मन भी बने।
तेजी से गिरते स्वास्थ्य एवं बढ़ते दबाव के कारण पुलित्ज़र ने 43 वर्ष की अवस्था में दि वर्ल्ड के संपादक पद को हमेशा के लिए छोड़ दिया। स्पेन के विरुद्ध ( क्यूबाई विद्रोह के समय) पुलित्ज़र के ऊपर कुछ लोगों ने ‘येलो जर्नलिज़्म’ का इल्जाम भी लगाया, पर बिना विचलित हुए वे संयत तरीके अपने संपादकीय के द्वारा प्रहार करते रहे। एक अवसर ऐसा भी आया जब अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट को भी उनके आगे झुकना पड़ा।जीवन का आखिरी कुछ समय पुलित्जर के लिए काफी कष्टपूर्ण बीता। इनकी आँखों की रौशनी चली गई। किसी भी तरह की आवाज़ से इन्हें एलर्जी होने लगी। कानों में असह्य पीड़ा के कारण ये शान्ति की ख़ोज में एकांत में चले गए। वहाँ से भी ये कोड्स के माध्यम से अपने संपादकीय भेजते रहे। इसके लिए पुलित्जर ने कुल 20,000 कोड इजाद किया। ऐसे समर्पित पत्रकार पुलित्ज़र का कोलंबिया स्कूल ऑफ़ जर्नलिज्म की स्थापना करवाने के बाद 1912 में देहान्त हो गया। यह अपने पीछे पत्रकारिता के सबसे अमूल्य पुरस्कार को छोड़ गए जो 1917 से प्रतिवर्ष इन्ही के नाम पर पत्रकारिता, इतिहास, कथा, साहित्य, काब्य, जीवनी, आत्मकथा, नाटक और संगीत की कुल 21 श्रेणियों में दिए जाते हैं। इस प्रकार इस पुरस्कार के माध्यम से ही पुलित्ज़र आज भी हमारे बीच हैं ।
अपने भविष्य से बेखबर पुलित्ज़र युवावस्था में अमेरिका आकर वहाँ की सेना में 1869 में भर्ती हो गए। पर अधिक समय तक वहाँ नहीं टिक पाये। बाद में उन्होंने जर्मनी के एक प्रमुख अख़बार ‘वेस्टलिशे पोस्ट’ में काम करना शुरू किया। अपने जुझारू एवं कर्मठ व्यक्तित्व के कारण पुलित्ज़र आगे चलकर वेस्टलिशे पोस्ट के हिस्सेदार भी बन गए।
पुलित्ज़र ने 19वीं सदी में ही ख़ोजी पत्रकारिता के महत्त्व पहचाना। उन्होंने अपनी खोजी पत्रकारिता का निशाना, सरकारी भ्रष्टाचारियों, टैक्स चोरी करने वाले लोगों एवं जुएबाजों आदि को बनाया। वे पत्रकारिता के महत्त्व को काफी अच्छी तरह समझते थे। एक बार उन्होंने कहा था कि अमेरिका का भविष्य गढ़ने की शक्ति पत्रकारों के भावी पीढ़ियों के हाथों में है।
मात्र 25 वर्ष की आयु में ही पुलित्ज़र एक प्रकाशक बन गए जिसके बाद बिज़नेस संबंधी सुझबुझ एवं दूरदर्शिता दिखाते हुए 1878 में ‘सेंट लुइस पोस्ट डिस्पैच’ के मालिक बन गए। इससे उनकी छवि जर्नलिस्ट एवं उद्यमी दोनों के रूप में निखर कर सामने आई। अब लोग उनकों काफी संजीदगी से लेने लगे।अब तक अमेरिका में रह रहे पुलित्ज़र पूर्ण अमेरिकी हो चुके थे। पर एक लक्ष्य को लेकर जुनून की हद तक मेहनत करने वाले पुलित्ज़र को इसकी कीमत चुकानी पड़ी। उनकी आँखे कमजोर हो गयीं। वे बीमार बड़ गए। डाॅक्टरों ने उन्हें छुट्टी पर जाने की सलाह दी। पर स्टीमर से सैर पर जाने की बजाए उन्होंने जे गोल्ड नामक फायनेंसर से ‘दि न्यूयाॅर्कवर्ल्ड ’ नामक अख़बार को खरीदने की बात की। यह अख़बार उस समय आर्थिक तंगी से गुजर रहा था। धुन के पक्के पुलित्जर ने इस अख़बार को भी वेस्टलीशे पोस्ट की तर्ज पर पुनः खड़ा कर दिया। यह बहुत बड़ी जीत थी। कुछ ही दिनों में ‘दि वर्ल्ड की बिक्री छः लाख प्रातियों तक पहुँच गयी और वह सबसे अधिक बिकने वाला अख़बार बन गया। इस अप्रत्याशित सपफलता से उनके कई दुश्मन भी बने।
तेजी से गिरते स्वास्थ्य एवं बढ़ते दबाव के कारण पुलित्ज़र ने 43 वर्ष की अवस्था में दि वर्ल्ड के संपादक पद को हमेशा के लिए छोड़ दिया। स्पेन के विरुद्ध ( क्यूबाई विद्रोह के समय) पुलित्ज़र के ऊपर कुछ लोगों ने ‘येलो जर्नलिज़्म’ का इल्जाम भी लगाया, पर बिना विचलित हुए वे संयत तरीके अपने संपादकीय के द्वारा प्रहार करते रहे। एक अवसर ऐसा भी आया जब अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट को भी उनके आगे झुकना पड़ा।जीवन का आखिरी कुछ समय पुलित्जर के लिए काफी कष्टपूर्ण बीता। इनकी आँखों की रौशनी चली गई। किसी भी तरह की आवाज़ से इन्हें एलर्जी होने लगी। कानों में असह्य पीड़ा के कारण ये शान्ति की ख़ोज में एकांत में चले गए। वहाँ से भी ये कोड्स के माध्यम से अपने संपादकीय भेजते रहे। इसके लिए पुलित्जर ने कुल 20,000 कोड इजाद किया। ऐसे समर्पित पत्रकार पुलित्ज़र का कोलंबिया स्कूल ऑफ़ जर्नलिज्म की स्थापना करवाने के बाद 1912 में देहान्त हो गया। यह अपने पीछे पत्रकारिता के सबसे अमूल्य पुरस्कार को छोड़ गए जो 1917 से प्रतिवर्ष इन्ही के नाम पर पत्रकारिता, इतिहास, कथा, साहित्य, काब्य, जीवनी, आत्मकथा, नाटक और संगीत की कुल 21 श्रेणियों में दिए जाते हैं। इस प्रकार इस पुरस्कार के माध्यम से ही पुलित्ज़र आज भी हमारे बीच हैं ।
सोमवार, 6 जुलाई 2009
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